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Thursday, October 23, 2008

जग अभी जीता नही है, मैं अभी हारा नही हूँ

धैर्य रखो
जानो और समझो
हो किंचित भी समय बाधित
हो ना किंतु ख़ुद से पराजित
काल ने जो कुछ चुना है
निशब्द निर्णय जो बुना है
उसे जियो
और पियो
जैसे शिव ने विष-पान किया था
कठोर को कोमल किया था
इसलिए शिव बनो
और धैर्य रखो

खोजो और सींचो
उस गुण-तत्व को
पत्तो से झड़ते अपनत्व को
संघर्ष जनेगी मेधा को फिर
आकाश बनेगा छाती तुम्हारी
प्रेम बनेगा भाषा तुम्हरी
नक्षत्र करेंगे रक्षा पग पग
राह में होंगे तारे जग मग
अपमान 'अब' का
कवच बनेगा 'तब' का
निर्माता का निर्माण हो तुम
तुम में है प्रारब्ध की छाया
बूंदे अमृत की तुम में भी हैं
इसलिए अन्धकार से डरना कैसा
अपने दीपक ख़ुद बनो
और धैर्य रखो

Thursday, March 20, 2008

On The Festival Of Colors : The Song Of Holi

तन्तु - प्रेरित गात्र हैं हम,

एक पुतले मात्र हैं हम,

इस जगत की नाटिका के -

क्षणिक भंगुर पात्र हैं हम,

इसलिए हर भूमिका में,

रंग भरे हम भूमिजा मे,

बन सके निरपेक्ष,

तो फिर ,

क्या दुआ क्या बद्दुआ है,

लग रहे हैं समय-बाधित,

आप अपने से पराजित,

चलो आज तम तो भगाएं,

रंगों का धुआं उडाये,

चलो आज होली मनाएं

Wednesday, October 17, 2007

नंगे पाँव मत चला करो आसमान में
कहीँ तारे ना चुभ जाएँ पाँव में

Friday, October 12, 2007

मिट्टी के दीये

कल शाम एक मित्र की डायरी में लिखे कुछ शब्दों को पढ़कर कि धर्म वैयक्तिक होता है, ना इससे कम ना इससे ज्यादा, एक कहानी याद आ गयी। कहानी शायद काफी पुरानी है - एक समुद्र का किनारा इस बात के लिए प्रसिद्ध था कि वहाँ बैठने वालो को समुद्र के अन्दर से घंटियों की आवाज सुनाई पड़ती है। शायद किसी समय में कोई भव्य मंदिर रहा हो जो समय के साथ विलीन हो गया हो और लहरों के टकराने से उस मंदिर की घंटियाँ बजती हो। एक दीवाना अपनी मौज में रोज उन घंटियों को सुनने आता था। लेकीन सिवाय लहरों की गर्जन के उसे कुछ सुनाई नही पड़ता था। फिर भी उसने संकल्प ले रखा था की उन घंटियों की आवाज सुनने का। एक दिन अचानक वो दीवाना जोर जोर से चीखने लगा की सुन ली मैंने घंटियों की आवाज। लोगो ने जब पूछा तो उसने कहा कि ये आवाजें समुद्र से नही मेरे अंतस से आती हैं, मैंने सुना है उन्हें । लोगो ने समझा कि बेचारा पागल हो गया लेकीन वो तो आल्हाद से भरा हुआ नाचने लगा। मैंने सुना है की आज भी वो यही बात कहता है।

आज नवरात्रि का पहला दिन है। नौ दिनों तक सारे देश में देवी की पूजा होगी।
मार्क्स का ये कथन कि धर्म अफीम का नशा है, आंशिक रुप से सत्य है। नौ दिनों तक लोग उपवास करेंगे ताकि देवी प्रस्सन होकर उन्हें मुँह माँगा वर दे। अधिकांश ने धन माँगा होगा। इस देश से ज्यादा भौतिक देश दुनिया में शायद ही कोई दूसरा हो। हम तो सीधे - सीधे लक्ष्मी को ही पूजते हैं।

मैं कभी कभी सोचता हूँ कि यदि हम अमर हो जाये तो क्या धर्म बचेगा। रसेल की धर्म का मूल आधार भय है। मेरे देखे से ये बात भी आंशिक रुप से ही सही है। संगठित धर्म का मूल आधार तो भय ही है। वैयक्तिक का प्रेम। इन दिनों धार्मिक चैनलों की बाढ़ आयी हुई है। धर्म गुरुओं को २४ घंटे ब्रह्म चर्चा में लीं देखा जा सकता है। सब इश्वर को खोजने का रास्ता बताते हैं। इस बात पर एक और कहानी याद आ गयी - जेन फकीर रिन्झाई के पास आ कर एक व्यक्ति ने पूछा की इश्वर को कहॉ खोजू। रिन्झाई भी अपने में एक विरला था। पास अपने डंडा रखता और मूर्खों के सर पर चला देता। लेकीन ख्याति उसकी बहुत थी। शायद इसी के चलते ये व्यक्ति भी रिन्झाई के पास आया था। उसका प्रश्न सुनकर रिन्झाई ने अपना डंडा उसके सर पे दे मारा और कहा -'जहाँ गुमा कर आया है वहीँ जा कर खोज'।

ईश्वर को खोजने से पहले उसे गुमाना भी तो जरुरी है।
कुछ दिनों पहले मेरे पुराने परिचित एक बालक से मिलना हुआ। उनकी उम्र कोई साठ वर्ष है लेकीन हैं वो बच्चे ही । उन्हें ब्रह्मचर्चा का बड़ा शौक है। उनकी हवाई बातें सुनने के लालच में मैं उनके घर आया जाया करता था। मिलते ही उन्होने कहा की कल भगवान् शिव मेरे सपनो में आया थे और कहा कि तुम्हे सात दिनों के अन्दर ब्रह्म ज्ञान हो जाएगा। मैंने उन्हें बधाई दीं, और मैं दे भी क्या सकता था।

Sunday, June 10, 2007

Garaj Baras : गरज बरस



धा धा धा,
धू धू ,
पेड़ों को छू-छू ,
खिसियानी बिल्ली सी,
घूमते फिरे लू ।

I remember papa reciting these lines for me from an unknown poet, when I was merely three feet high, trying to squeeze myself in the comfort of his arm, saving myself from the warm summer wind 'loo'. These winds always seemed to me the warm breath coming out of nostrils of god, furious at us, the sinful human beings. The fury, the heat, the summer.

We, the mortals, have already survived through the scorching months of April & May, yet trying our best to live through June. Its the time for Monsoon to knock our doors, with thundering & showering black clouds. Its time for Antonio Vivaldi's summer euphony to end.

I've always been in love with the rainy season. For me, at this time, Isis ( Egyptian mother goddess) dances all around, showering rain, & providing a new liveliness to near-dying earth.

I join reknowned urdu poet Nida Fazli, of what he prays for the arrival of raining clouds, & making this planet once again vibrant.

गरज बरस प्यासी धरती पर,
फिर पानी दे मौला।

Funnily enough, I came back yesterday from a week long trip to two metros, Chennai & Mumbai, & it started raining at both places as soon as I left ( thats what I have been told on the phone). Now, is it a jest played on me by mother nature ?
I hope to see the rains soon. Just looked out of my window this morning & saw dense black clouds hovering over the sky. Yippee !

Saturday, January 06, 2007

Leaves Of Love

चांदनी मे नहायी हुई,
रात के सन्नाटे को चीरती,
प्रेमी का प्रेयसी के
दरवाजे पर दस्तक,
एक अन्तराल एक मौन,
प्रेयसी की आवाज - 'कौन'
प्रेयसी की आवाज से प्रेमी का ह्रदय आलब्ध
निकले शब्द ,
मै ,
तेरा प्रेमी ,
जिसकी तुने राह तकी
फिर भी ना तेरी आँखे थकी
रह ना सका
चाह कर भी कुछ कह ना सका,
सुनकर तेरी पुकार
आ गया तेरे द्वार,
दोनो को प्यार है
दोनो का सारा संसार है।



फिर अन्तराल ,
फिर मौन,
बन्द दरवाजे से ही,
वह बोली,
प्रेम भले से सतरंग है,
किन्तु ये गली तंग है,
प्रेम अछुता आलिंगन है,
स्वतंत्र करता ये बंधन है,
इसलिये,
मेरे प्रेमी तुम हो नही सकते
प्रेम में दो हो नही सकते,
प्रेम मे तो सिर्फ एक,
तो,
जाऒ,
और उस एक को,
खोज के लाऒ,
तब फिर आना इस पार,
तब खुलेंगे मेरे द्वार।

शब्द ऐसे सुनकर,
खुद में खुद को बुनकर,
चल निकला वह,
चलते चलते,
उस एक को पाने की चाह में ,
भूल गया वह राह भी अपनी ,
सालो बीते ,
बीते कई वसंत ,
था वह अब भी असमंजस में,
दो को एक बनाऊ कैसे,
दोहराता अपने अंतस में,
हार कर एक दिन,
आखे मींचे,
बैठ गया एक पेड़ के नीचे ,
सारी ऊसने खोज बंद की ,
तभी अचानक ,
मौन में,
वही मिल गया,
जिसको पाने वह निकला था,
जिसमे सारा जीवन निकला था ।



था वह पूरा जागा ,
वापस भागा,
चमक रहीं थी आखे उसकी ,
मसतक भी,
फिर दरवाजे पर दस्तक दी,
फिर प्रेयसी की आवाज आई,
'कौन'
प्रेमी बोला ,
आज मै नही आया ,
आया है सावन प्रेम का ,
आई है नयी खुशबू ,
प्रेम की इस गली मे मैं नही ,
अब है सिर्फ तू ही तू,
सुनकर यह,
जैसे वीणा के तार हिल गये ,
सालो से बंद पडे ,
द्वार खुल गये ।



( जलालुद्दीन रूमी की छोटी किन्तु अत्यंत रहस्यवादी कहानी से प्रेरित )

I apologise dearly for the spelling mistakes. The blame though I would bestow upon my lack of knowledge of any other better software to write the above poem in hindi rather than lack of my lingual knowledge. I also, impart Tushar Waghela my gratitude without whose help posting my poems in hindi on my blog was quite out of question.


 

Wednesday, January 03, 2007

Practising The Art Of Ignorance

कल
नंगे डायोजिनस को बुत के आगे ,
हाँथ फैलाते देखकर ,
रूककर,
मैने पूछा,
तू क्या कर रहा ह,ै
क्या बता रहा ह,ै
पत्थर के आगे हाँथ फैला रहा ह,ै
गहरी साँस लेकर ,
मुस्कुराकर उसने कहा -
मैं पागल हूँ ,
यह तुम सबका विश्वास है,
लेकिन पत्थर के आगे हाँथ फैलाना,
मेरे उपेक्षित होने कि कला,
का अभ्यास है ।